वास्तु शास्त्र

वास्तु शास्त्र

वास्तु शास्त्र के मूल सिध्दांतो में रखकर आप अपने घर में खुशहाली ला सकते हैं। कामयाबी की सीढिया चढ़ सकते हैं इस बार हम आपको वास्तुशात्र के मुताबिक उन आठ दिशाओं के बारे में बताएँगे जिसकी खासियत जान लेने के बाद आप शुरूआती दौर में कुछ आवश्यक सावधानिया बरक सकते हैं।

पूर्व दिशा: -

पूर्व दिशा “सूर्योदय की दिशा” भी कहते हैं। पूर्व दिशा “पितृस्थान” सूचक हैं। इस वजह से पितृ उपासना करते समय मुंह पूर्व दिशा में किया जाता हैं। पूर्व दिशा में अग्नि तत्व होता हैं। इस दिशा का स्वामी इंद्र हैं। पूर्व दिशा सूर्य किरणों का प्रवेशद्वार मानी जाति हैं। इसलिए वास्तुशास्त्र में पूर्व दिशा खली रखने के लिए कहा जाता हैं।

पश्चिम दिशा: -

इस दिशा को “सूर्यास्त की दिशा” कहते हैं। इसका स्वामी वरुण यानी वायु देवता हैं। इस दिशा में वायु का प्रभाव रहता हैं। पश्चिम दिशा को सुख और समृद्धि का प्रतिक माना जाता हैं। वायु चंचल होता हैं, इसलिए पश्चिम मुखी वास्तु में रहनेवाले लोग प्रसन्न और विनोदप्रिय होते हैं।

उत्तर दिशा: -

उत्तर दिशा “मातृभाव” दर्शक हैं। रात को इस दिशा में ध्रुव तारा नज़र आता हैं। इस दिशा में जल तत्व का स्थान हैं। उत्तराभिमुख वास्तु पर हमेशा देवी लक्ष्मी की कृपा रहती हैं और धन-धान्य-समृद्धि प्राप्त होती हैं। उत्तर दिशा में ध्रुव तारा स्थिर रहता हैं। उत्तर दिशा से मिलाने वाला प्रकाश वास्तु लिए लाभदायक होता

दक्षिण दिशा:

इस दिशा में “पृथ्वी तत्व” होता हैं। इसका स्वामी याम हैं। इसलिए इस दिशा को “मुक्ति प्रदान” करने वाली दिशा कहते हैं। दक्षिणमुखी घर में रहने वाले लोगो को धैर्य और सिरता प्राप्त होती हैं। परन्तु कुछ लोग दक्षिणमुखी वास्तु को अशुभ मानते हैं।

चार उपदिशा: - ईशान, अग्नि, नैऋत्य और वायव्य

इशान दिशा: -

उत्तर और पूर्व दिशा के बिच में जो कोना बनता हैं, उसे इशान दिशा कहा जाता हैं। चारों उपदिशाओं में इशान दिशा को पवित्र माना जाता हैं। इसलिए साधना, आराधना, विद्यार्जन, लेखन जैसे कार्य करने के लिए इशान दिशा शुभ और लाभदायक होते हैं। ईशान कोण मनुष्य को बुद्धि, ज्ञान, विवेक, धैर्य और साहस प्रदान कराता हैं। इसलिए घर के इस कोने को हमेशा स्वच्छ और पवित्र रखना चाहिए।

अग्नि दिशा: -

दक्षिण और पूर्व दिशा के बिच में जो कोन बनता हैं, उसे अग्नि दिशा कहा जाता हैं। यह कोना स्वास्थ्य प्रदान हैं। इस दिशा में अग्नि तत्व स्थिर माना जाता हैं। अगर घर का यह कोना गन्दा रखा तो घर के लोगो का स्वास्थ्य बिगड़ता है। इस दिशा में बिजली या अग्नि के उपकरण और लोखंड का सामान रखना लाभकारक होता हैं।

नैत्रत्य दिशा: -

दक्षिण और पश्चिम दिशा के बिच के कोने को नैत्रत्य दिशा कहते हैं। यह दिशा शत्रुनाशक हैं। इसका स्वामी राक्षस हैं। इस दिशा का गलत उपयोग करने से अकाल मृत्यु हो सकती हैं। इस दिशा में दूषित सामान रखने से घर के लोगो का चरित्र दूषित बनता हैं। और शत्रु ताकतवर बनता हैं तथा घर में तकलीफ बढती हैं।

वायव्य दिशा: -

उत्तर और पश्चिम दिशा के बिच का कोना वायव्य दिशा होती हैं। यह दिशा शुभ फलदायी हैं। वायव्य दिशा होती हैं। यह दिशा मनुष्य को दिर्घायु, स्वास्थ और शक्ति प्रदान करती हैं। इस कोने को दूषित रखने से मित्र भी शत्रु बनने लगता हैं तथा कही से भी पीड़ा आने लगती हैं और घर का प्रमुख व्यक्ति अहंकारी होने लगता हैं।

वास्तुशास्त्र में पंचमहाभूतों का महत्त्व:

वास्तु में रहने वाले मनुष्य के तन और मन पर पंचमहाभूतों का असर होता हैं। इसलिए घर बनाने का या घर का चयन करने का काम विचारपूर्वक करना चाहिए।
मनुष्य का शरीर पंचमहाभूतों से बना हुआ हैं।
(१) आकाश, (२) वायु, (३) तेज़, (४) अग्नि, (५) पृथ्वी

किसी भी सजीव पर पंचमहाभूतों का असर निच्छित होता हैं। मनुष्य के सत्व रज और तम इन स्वभावो की वजह से ही पंचमहाभूतों का प्रभाव रहता हैं।

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  • वास्तु संबंधीउपयुक्त मुहूर्त
  • वास्तुशास्त्र और रेकीका संबंध
  • कौनसे महीने में बांधकाम शुरू करे
  • शनि और वास्तु का संबंध
  • व्यापारियों की बैठक किस दिशा में होनी चाहिए
  • वास्तुशास्त्र के कुछ महत्वपूर्ण नियम

वास्तु सम्बन्धी उपयुक्त मुहूर्त: -

मुहूर्त का मतलब है की किसी अच्छे कार्य के लिए शुभ समय निश्चित करना। वास्तु के लिए भी मुहूर्त निकलना आवश्यक है।

भूमिपूजन मुहूर्त: -

वैशाख, श्रावण, मार्गशीर्ष, फाल्गुन यह महीने भूमिपूजन मुहूर्त के लिए उपयुक्त और श्रेष्ठ होने के साथ धन और ऐश्वर्य प्राप्ति करने वाले है।

गृहप्रवेश का मुहूर्त: -

मार्गशीर्ष, फाल्गुन, वैशाख, श्रावण, उत्तरायण ये महीने गृहप्रवेश करने के लिए उत्तम होते है। पुराने घर की मरम्मत करने के बाद गृहप्रवेश करने के लिए वैशाख मार्गशीर्ष, वैशाख ये महीने अच्छे उत्तम है।
चैत्रमास रविवार, मंगलवार, अमावस्या, दुष्टचन्द्र, जन्मस्थ चंद्र और जन्म लग्न में गृहप्रवेश नहीं करना चाहिए।

वास्तुशांति का मुहूर्त: -

तीनो उत्तरा, रोहिणी, हस्त, धनिष्ठा, शततारका, पुनर्वसु, गंधा, स्वाती, अश्विनी, रेवती, अनुराधा, पुष्प चित्रा, मृग नक्षत्रे उत्तम है। वैशाख, श्रावण मार्गशीर्ष, फाल्गुन ये महीने उत्तम है। चैत्र, आषाढ़, भाद्रपद ये महीने योग्य नहीं है।

वास्तुशास्त्र और रेकीका संबंध: -

वास्तुशास्त्र पंचमहाभूतों पर आधारित है। वैश्विक ऊर्जा अच्छी तरह से ग्रहण करने के लिए घर के अंदर की रचना वास्तुशास्त्रनुसार करनी चाहिए।
निसर्ग में जो आदिशक्ति है उसे ही रेकी कहते है। रेकी के इस्तमाल से आदमी शारीरिक, मानसिक और आध्यामिक उन्नति कर सकता है।

कौनसे महीने में बांधकाम शुरू करे: -

१) चैत्र महिना – इस महिने में काम शुरू करने से अनेक प्रकार की बीमारियाँ आती है।
* २) वैशाख महिना – इस महिने में काम शुरू करे तो घर में धन-धान्य, पशु-पक्षी में वृद्धि होती है।
३) जेष्ठ महिना – इस महिने में काम शुरू करने से घर की समृद्धि जाती है और मृत्यु भी हो सकती है।
* ४) आषाढ़ महिना – इस महिने में बांधकाम चालू करने से संपत्ति, नौकर-चाकर, पशु-पक्षी में बढ़ती होती है।
* ५) श्रावण महिना – इस महिने में काम शुरू करने से धन-धान्य, संपत्ति और शान्ति मिलती है।
६) भाद्रपद महिना – इस महिने में काम शुरू करने से लगातार नुकसान होता है।
७) अश्विन महिना – इस महिने में काम शुरू करने से पत्नी सुख ना के बराबर हो जाता है।
* ८) कार्तिक महिना – इस महिने में काम शुरू करने से घर में शान्ति, आरोग्य और धन-धान्य अच्छा रहता है।
* ९) मार्गशीर्ष महिना – इस महिने में काम शुरू करने से घर में कभी भी खाने-पिने की कमी नहीं रहती।
१०) पोष महिना – इस महिने में काम शुरू करने से घर में चोरी-चकारी ज्यादा होती है।
११) माह महिना – इस महिने में घर बांधने की शुरुआत करने से घर में सुख-समृद्धि आती है या फिर घर में आग लगती है।
* १२) फाल्गुन महिना – इस महिने में काम शुरू करने से घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है और उन्नति होती है।

शनि और वास्तु का संबंध: -

अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि किसी भी स्थान पर हो और उस व्यक्ति ने घर बांधना शुरू किया तो उस व्यक्ति को तीन से अठारह वर्ष में शनि शुभ-अशुभ फल देता है। वास्तु और शनि का संबंध और उपाय इस प्रकार है:
१) वास्तु बनाने समय उस व्यक्ति की कुंडली में पहले (लग्न) स्थान पर शनि हो और सातवां तथा दसवां स्थान स्थान खाली हो तो शनी वास्तुसुख देता है।
२) दूसरे स्थान पर शनि हो तो कार्य में बाधाएं आती है फिर भी जैसे भी हो वास्तु बना ले। ऐसा करने से शनि शुभ फल देता है।
३) तिसरे स्थान में शनि हो तो घर बनने के बाद घर में तीन शुभ फल देता है।
४) चौथे स्थान में शनी हो तो खुद का घर नहीं बनाना चाहिए शनी का असर जाने तक किराए के घर में रहे। फिर भी अगर घर बनाया तो माँ, दादी, सास और मामा इन चारों को तकलीफ होने की संभावना होती है।

५) पांचवे स्थान में शनी होने पर बाँधने की शुरुआत की तो बच्चो को तकलीफ होती है। परन्तु लड़के से घर बनाने में कोई बाधा नहीं होती। फिर भी अगर घर बनाना है तो आयु के ४८ वर्ष के बाद ही घर बाँधने का कार्य शुरू करे। घर की नींव खोदने से पहले शनी के वाहन की पूजा करे।

६) छठे स्थान पर शनी हो तो आयु के ३५ या ३९ वर्ष में घर बनाए। उससे पहले घर बनाने से लड़की को ससुराल में तकलीफ सहनी पड़ती है।
७) कुंडली के सातंवे स्थान में शनी होने से व्यक्ति को अच्छा वास्तुख प्राप्त होता है। पूरी तरह से सजा हुआ तैयार घर भी सहजता से मिल जाता है। परन्तु शनी इस स्थान पर अशुभ होतो घर बेचना पड़ता है।
८) आठवें स्थान पर शनी होने से नए घर की शुरुआत से पूर्ण निर्माण तक बहुत तकलीफों और बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इस स्थान में राहु और केतु शुभ हो तो वास्तुविषयक फल शुभ होता है।

९) अगर शनी नवें स्थान में हो तो माता या पत्नी गर्भवती होने पर ही निर्माण कार्य शुरू करें। खुद का और पिता का धन मिलाकर घर की रचना करें।

१०) दसवें स्थान में शनी हो तो नया घर बनाने की शुरुआत न करें, क्योंकि अगर घर बन भी गया तो भी उससे कोई लाभ नहीं होता। कई बार घर पूरी तरह से तैयार नहीं हो पाता।

११) ग्यारहवें स्थान में शनी हो तो वास्तु सुख देर से आता है ५५ की उम्र के बाद वास्तु का योग आता है। ध्यान रखें की घर का दरवाज़ा दक्षिण दिशा में न हो अन्यथा घर में बिमारी आती है।

१२) यदि शनि बारहवें स्थान में हो तो चौरसाकृति घर बनाए क्योंकि ऐसा घर विशेष लाभदायक होता है औंर ऐसा करने से काम कष्ट में घर बन जाता है।

व्यापारियों की बैठक किस दिशा में होनी चाहिए: -

अपने दुकान या कार्यालय में किस दिशा में बैठना चाहिए इस बारे में वास्तुशास्त्र के कुछ निश्चित नियम है। व्यापारिओं का आसन उत्तर या पूर्व दिशा में मुंह बाकी दिशाओं की और हो तो संबंधित व्यापारी को व्यापर करने में बहुतसी अड़चने आती है उसका पूरी तरह से ठप्प हो जाता है अगर किसी व्यापारी की कुंडली में उसके जन्म के समय राहु या शुक्र बलवान हो तो ऐसे व्यापारी को आसन दक्षिण दिशा में बनाना चाहिए। दक्षिणाभिमुखी आसन भी ऐसे व्यापारियों को शुभ फल देता है।

व्यापारिओं के आसन की दिशा को वास्तुशास्त्र में बहुत महत्त्व दिया है।

वास्तुशास्त्र के कुछ महत्वपूर्ण नियम: -

भूगर्भशास्त्र, रसायनशास्त्र, खगोलशास्त्र इसी तरह वास्तुशास्त्र भी एक शास्त्र है यह वास्तुशास्त्र निसर्ग पर आधारित है। वास्तुशास्त्रानुसार शुद्ध स्वरूप घर बाँधने के लिए निचे कुछ नियम दिए हुए है उनका पालन करें।
१) प्लॉट में उतार पूर्व-उत्तर दिशा में होना चाहिए।
२) प्लॉट का आकार चौरस या काटकोंन होना चाहिए।
३) प्लॉट की जमीन का परिक्षण प्लॉट में खड्डा बना के उसमे पानी भरके करना चाहिए। पानी तुरंत जमीन में समाना नहीं चाहिए।
४) प्लॉट में पानी का संचय (ग्राऊंड वाटर टैंक) पूर्व या उत्तर दिशा में होना चाहिए।
५) वास्तु का स्थान प्लॉट में नैऋत्य कोने में होना चाहिए।
६) प्लॉट में खाली जगह पूर्व-उत्तर दिशा में ज्यादा होनी चाहिए।
७) प्लॉट में तुलसी वृंदावन पूर्व दिशा में होना चाहिए।
८) प्लॉट में सेप्टिक टैंक पश्चिम दिशा में होना चाहिए।
९) पेड़-पौधे दक्षिण या पश्चिम दिशा में होना चाहिए।
१०) प्लॉट में ओवरहेड टैंक पश्चिम दिशा में होना चाहिए।
११) प्लॉट में बिजली का खंबा अग्नि दिशा में होना चाहिए।
१२) प्लॉट में ड्रेनेज और कूड़ा-कचरा पश्चिम दिशा में होना चाहिए।
१३) मुख्य वास्तु की दीवारें दक्षिण-पश्चिम दिशा में ज्यादा मोती होनी चाहिए।
१४) मुख्य वास्तु की खिड़कियां पूर्व-उत्तर दिशा में होनी चाहिए।
१५) मुख्य वास्तु में पूजाघर इशान कोने में होना चाहिए।
१६) मुख्य वास्तु में सीढियाँ पश्चिम दिशा में चढ़ती हुई होनी चाहिए।
१७) मुख्य वास्तु में शौचकूप पश्चिम दिशा में होना चाहिए।
१८) मुख्य वास्तु में कोठी (अनाज रखने का कमरा) वायव्य दिशा में होनी चाहिए।
१९) गॅरेज, आउट हाउस वायव्य कोने में होना चाहिए।
२०) प्लॉट के सामने मंदिर या बड़े पेड़ नहीं होने चाहिए।

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