योग साधना

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योग साधना

योग मनुष्य को सकारात्मक चिंतन के प्रशस्त पथ पर लाने की एक अद्भुत विदया है। जिसे करोडो वर्ष पूर्व भारत के प्रज्ञावान ऋषि-मुनियो ने आविष्कृत किया था इसी उष्टांग योग का उपदेश और अभ्यास पूज्य बापूजी श्रीमान नागेंद्र जी अपने प्रवचन एवं योग-प्रशिक्षण आध्यात्म में करते कराते है। उनका निष्कर्ष है कि स्वस्थ व्यक्ति असुर सुखी समाज का निर्माण केवल योग के शरण में जाकर ही हो सकता है।
इस स्वस्थता कि प्राप्ति हेतु आहार, निंद्रा एवं ब्रह्मचर्य तीन (स्तम्भ) खम्भे है।
  • आहार
  • निंद्रा
  • ब्रह्मचर्य
इन तीनो स्तम्भों एवं अन्य नियमों के विषय में संक्षिप्त रूप से विचार करते है।
  • व्यायाम
  • स्न्नान

आहार: -

आहार से व्यक्ति के शरीर का निर्माण होता है। आहार का शरीर पर ही नहीं मन पर भी पूरा प्रभाव पड़ता है।

निंद्रा: -

निंद्रा अपने आप में एक पूर्व सुखद अनुभूति है यदि व्यक्ति को नींद न आये तो पागल भी हो सकता है। निंद्रा देखने में तो कुछ नहीं लगती परन्तु जिन को नींद नहीं आती वे ही जानते है इसका क्या महत्त्व है।

ब्रह्मचर्य: -

अपनी इन्द्रियों एवं मन को विषयो से हटाकर ईश्वर एवं परोपकार में लगाने का नाम ब्रह्मचर्य है केवल उपस्थ इन्द्रिया का संयम मात्रा ही ब्रह्मचर्य नहीं है। इन्द्रियों एवं मन की शक्ति का रूपांतरण कर उनको आत्ममुखी कर ब्रह्म की प्राप्ति करना ब्रह्मचर्य है।

व्यायाम: -

इस शरीर को चलाने के लिए आहार की आवश्यकता है वैसे ही आसान प्राणायाम आदि व्यायाम की भी परमावश्यकता है। बिना व्याम के शरीर अस्वस्थ तथा ओज़ एवं आलसी हो जाता है। जबकि नियमित रूप से व्यायाम करने से दुर्बल, रोगी एवं कुरूप व्यक्ति भी बलवान स्वस्थ एवं सुन्दर बन जाता है।

स्न्नान: -

आसन आदि के पश्चात् शरीर का तापमान सामान्य होने पर स्न्नान करना चाहिए, स्न्नान से शरीर में ताज़गी आती है। अनावश्यक गर्मी शांत होकर शरीर शुद्ध एवं हल्का बन जाता है।

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि - ये योग के आठ अंग है।

यम: -

अष्टांग योग का प्रथम अंग है यम।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह ये पांच यम है।
इन यमो की परिगणना इस प्रकार की है
  • अहिंसा
  • सत्य
  • अस्तेय
  • ब्रह्मचर्य
  • अपरिग्रह

अहिंसा: -

अहिंसा का अर्थ है किसी भी प्राणी को मन, वचन तथा काम से कष्ट न देना।

सत्य: -

जैसा देखा, सुना, तथा जाना हो वैसा ही शुद्ध भाव मन में हो वही वाणी तथा उसी के अनुरूप कार्य हो तो वह सत्य कहलाता है।

अस्तेय: -

अस्तेय का अर्थ है चोरी न करना।

ब्रह्मचर्य: -

कामवासना को उत्तेजित करने वाले, खान-पान, दृश्य-श्रव्य व श्रृंगार आदि का परित्याग कर सतत वीर्य रक्षा करते हुए उध्र्व रेता होना ब्रह्मचर्य कहलाता है।

अपरिग्रह: -

अपरिग्रह का अर्थ है चारों और से संग्रह (इकठ्ठा) करने का प्रयत्न करना। इसके विपरीत जीवन जीने के लिए न्यूनतम धन, वस्त्र आदि पदार्थो व मकान से संतुष्ट होकर जीवन के मुख लक्ष्य ईश्वर-आराधना करना अपरिग्रह है।
  • विदया एवं तप के अनुष्ठान से आत्मा तथा ज्ञान से बुद्धि निर्मल बनती है।
  • जल से शरीर शुद्ध होता है।
  • सत्य से मन की शुद्धि होती है।
  • भोग को हम नहीं भोगते, भोग हमे भोग लेता है।
  • तप नहीं तपा जाता हम स्वयंम तप जाते है।
  • काल का अंत नहीं होता, हम ही काल में समां जाते है।
  • तृष्णाएं जीर्ण नहीं होती, हम स्वयं जीर्ण हो जाते है।
शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर-प्रणिधान ये पांच नियम है।
  • शौच
  • सन्तोष
  • तप
  • स्वाध्याय
  • ईश्वर-प्रणिधान

शौच: -

शौच कहते हैं शुद्धि को पवित्रता को यह शौच शुचिता या पवित्रता भी दो प्रकार की होती है: एक बाह्य, दुसरी आभ्यंतर।

सन्तोष: -

अपने पास विदयमान समस्त साधनों से पूर्ण पुरुषार्थ करें। जो कुछ प्रतिफल मिलता है उससे पूर्ण संतुष्ट रहना और अप्राप्त की इस्छा न करना अर्थात पूर्ण पुरुषार्थ एवं ईश्वर कृपा से जो प्राप्त हो उसका तिरस्कार न करना तथा अप्राप्त की तृष्णा न रखना ही सन्तोष है।

तप: -

अपने साद उद्देश्य की सिद्धि में हो भी कष्ट, बाधाएं, प्रतिकलताये आये, उनक सहजता से स्वीकार करते हुए निरन्त बिना विचलित हुए अपने लक्ष्य की और बढ़ना तप कहलाता है।

स्वाध्याय: -

प्रणव-ओंकार का जप करना तथा मोक्ष की और जाने वाले वेद-उपनिषद, योग दर्शन, गीता आदि जो सत्यशास्त्र हैं, इनका श्रद्धापूर्वक अध्यन करना स्वाध्याय हैं।
इस प्रकार साधक सहज होकर विवेकपूर्वक विचार करेगा तो व बाहर के वैभव में न फ़सकर प्रणव (ओंकार) का जप तथा ऋषि प्रतिपादित अध्यात्म विदया, परा विदया के ग्रंथो का अध्ययन करता हुआ परमेश्वर का सानिध्य प्राप्त कर सफल हो सकता हैं।

ईश्वर-प्रणिधान:-

गुरुओं के भी गुरु, परम गुरु परमात्मा में अपने समस्त कर्मो का अर्पण कर देना भगवान को हम वही समर्पित कर सकते हैं जो शुभ हैं। दिव्य व पवित्र हैं। इसलिए साधक पूर्ण श्रद्धा, भक्ति व सर्वात्मना प्रयत्न से वही कार्य करेगा, जिसे वह भगवान को समर्पित कर सके अर्थात उसकी समस्त क्रियाओं का ध्येय ईश्वर-अर्पण होगा।

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