ज्योतिष शास्त्र

ज्योतिष शास्त्र

भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनेक अंग हैं। परन्तु उनमें ” गणित ” और ” फलित ” का स्थान ही सर्वप्रमुख है। फलित ज्योतिष द्वारा मानव-जीवन पर पड़ने वाले विभिन्न ग्रहों के शुभाशुभ प्रभाव का विचार किया जाता है। मनुष्य जिस समय में जन्म लेता है , उस समय आकाश-मंडल में विभिन्न ग्रहों की जो स्थिति होती है, उसका प्रभाव उसके सम्पूर्ण जीवन पर पड़ता रहता है। फलित ज्योतिष का सबसे बड़ा लाभ यही है की जिस प्रकार दीपक अँधेरे में राखी हुई वस्तुओं को प्रदर्शित करता है उसी प्रकार जन्मकुंडली द्वारा जीवन में घटने वाली घटनाओं के ज्ञान का उद्घाटन होता है।
जन्मकुंडली के किस भाव में स्थित कोनसा ग्रह जातक के जीवन अपना कैसा प्रभाव प्रदर्शित करता है। विभिन्न भावों पर पड़ने वाली ग्रहों की दृस्टि तथा एक ही भाव में एक से अधिक ग्रहों की युति होने पर भी फलादेश में अंतर आ जाता है ईस प्रकार कुछ ग्रह भिन्न फल प्रदर्शित करते है।
ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रमा की एक कला को तिथी माना जाता है। आकाश मंडल में असंख्य तारिकाओं के समूहों द्वारा जो विभिन्न प्रकार की आकृतियां बनती हैं, उन्हीं आकृतियों, अर्थात ताराओं के समूह को नक्षत्र कहा जाता हैं।

ज्योतिष शास्त्र में नवग्रह ग्रहों का स्वभाव और प्रभाव:

१) सूर्य: -

यह ग्रह पुरुष जाति, रक्त वर्ण, पित्त प्रकृति तथा पूर्व दिशा का स्वामी हैं। यह आत्मा, आरोग्य स्वभाव, राज्य, देवालय का सूचक एवं पितृकारक हैं। इससे पिता के संबंध में विचार किया जाता हैं। मेरुदंड, स्नायु, कलेजा, नेत्र आदि अवयवो पर इसका विशेष प्रभाव होता हैं।

२) चंद्र: -

यह ग्रह स्त्री जाति, श्वेतवर्ण जलीय तथा पश्चिमोत्तर दिशा का स्वामी हैं। यह मन, चित्तवृत्ति, शारीरिक, स्वास्थ्य, संपत्ति, राजकीय-अनुग्रह, माता-पिता तथा चतुर्थ स्थान का कारक हैं। यह रक्त का स्वामी हैं था वातश्लेष्मा इसकी धातु हैं।

३) मंगल: -

यह ग्रह पुरुष जाति, रक्त वर्ण, दक्षिण दिशा का स्वामी अग्नि तत्व वाला तहा पित्त प्रकृति का हैं। यह धैर्य तथा पराक्रम का स्वामी बाइभबहन का करक तहा रक्त एवं शक्ति का नियामक कारक हैं। ज्योतिष शास्त्र में इसे पाप ग्रह माना गया हैं। यह उत्तेजित करने वाला तुष्णाकार तथा सदैव दुःखदायक रहता हैं।

४) बुध: -

यह गृह नपुसंक जाति, शाम वर्ण, उत्तर दिशा का स्वामी, त्रिदोष प्रकृति तथा पृथ्वी तत्व वाला है। यह ज्योतिष, चिकित्सा, शिल्प, क़ानूसन, व्यवसाय चतुर्थ तथा स्थान तथा दशम स्थान का करक है।

इसके द्वारा गुप्तरोग संग्रहणी, वातरोग, श्वेत कुष्ठ, गूंगापन, बुद्धिभ्रम, विवेक शक्ति, जिल्हा तथा तालु आदि शब्द के उच्चारण से सम्बंधित अवयो का विचार किया जाता है।

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५) गुरु: -

यह गृह पुरुष जाति पीत वर्ण पूर्वोत्तर दिशा का स्वामी तथा आकाश तत्व वाला है। यह काम धातु तथा चर्बी की वृद्धि करता है। इसके द्वारा घर, विदया, पुत्र, पौत्र, आदि का विचार किया जाता है। इसे ह्रदय की शक्ति का कारक भी माना जाता है।

६) शुक्र: -

यह गृह स्त्री जाति, श्याम-गौर वर्ण दक्षिण-पूर्व दिशा का स्वामी कार्य कुशल तथा जलीय तत्व वाला है। यह कफ वीर्य आदि धातुओं का कारक माना जाता है। इसके प्रभाव से जातक के शरीर का रंग गेहुंआ होता है। यह काव्य-संगीत वस्त्राभूषण, वाहन शैया, पुष्प, आँख, स्त्री(पत्नी) तथा कामेच्छा आदि का कारक है।

७) शनि: -

यह गृह नपुसंक जाति, कृष्ण वर्ग पश्चिम दिशा का स्वामी, वायु तत्व तथा वातश्लेष्मिक प्रकृति का है। इसके द्वारा वायु शारीरिक बल, दृढ़ता विपत्ति, प्रभुता, मोक्ष, यश, ऐश्वर्य, नौकरी योगाभ्यास विदेशी भाषा एवं मूर्छा आदि।

८) राहु:

यह कृष्ण वर्ण, दक्षिण दिशा का स्वामी तथा कर गृह है। यह जिस स्थान पर बैठता है, वंहा की उन्नति को रोक देता है यह गुप्त युक्तिबल, कष्ट तथा त्रुटिओ का कारक है।

९) केतु: -

यह कृष्ण वर्ण तथा क्रूर ग्रह हैं। इसके द्वारा नाक, हाथ-पाँव क्षुधाजनित कष्ट एवं चर्मरोग आदि का विचार किया जाता है। यह गुप्त शक्ति बल कठिन, कर्म, भय की कमी का कारक है। कुछ स्थितियों में केतु शुभ ग्रह भी माना जाता है।

नवग्रह मंत्र (स्त्रोत्र):

सूर्य: – जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महद्युतिम्।
तमोरि सर्व्पापध्व्नं प्रणतोस्मि दिवाकरम्।।
चंद्र: – दधिशंखतुषारंभ क्षीरोदार्णव-सम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं शंभोमुर्कुटभूषणम्।।
मंगल: – धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कान्ति समप्रभम्।
कुमारं शक्ति हस्तं च मंगल प्रणमाम्यहम्।।
बुध: – प्रियंगुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं स बुध।
सौम्यं सौम्यगुणोपंत तं बुधं प्रणमाम्यहम्।।
गुरु: – देवनांच ऋषीणांच गुरु कांचनसन्निभम्।
बुध्दिभूतं त्रिलोकेंश तं नामामि बृहस्पतिम्।।
शुक्र: – हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्।
सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्।।
शनि: – नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छाया मार्तड संभूतं तं राहु प्रणमाम्यहम्।।
केतु: – पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम्।
इतिव्यास मुखोद्रितं य: पठेत् सुसमाहित: ।।

ज्योतिष के अनुसार कालसर्प

कालसर्प योग:

ज्योतिष के अनुसार अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प दोष लगता है तो उसके जीवन में कई तरह की समस्याए आती है। कालसर्प दोष वालो के बनते हुए भी कार्य बिगड़ जाते है। ज्योतिषाचार्य पं: प्रकाश भाट (गुरूजी) ने बताया की काल-सर्प दोष कुंडली के १२ भावी में राहु और केतु की उपस्थिति क्रम से कुल १२ प्रकार के काल सर्प योग होते है।

जाने १२ काल सर्प योग एवं उनके कारण होने वाले प्रभाव:

१) अनंत कालसर्प योग: -

यदि लग्न में राहु एवं सप्तम् में केतु हो तो यह योग बनता है, इसके कारण जातक कभी शांत नहीं रहता, झूठ बोलना एवं षडयंत्रो में फँस कर कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगता रहता है।

२) कुलिक कालसर्प योग: -

यदि राहु धन भाव में एवं केतु अष्ठम हो तो यह योग बनता है, इस योग में पुत्र एवं केतु अष्ठम हो तो यह योग बनता है, इस योग में पुत्र एवं जीवन साथी सुख, गुर्दे की बिमारी, पिता सुख जा अभावं एवं कदम-कदम पर अपमान सहना पद सकता है।

३) वासुकि कालसर्प योग: -

यदि कुंडली के तृतीय भाव में राहु एवं नवम भाव में केतु हो एवं इसके मध्य सारे ग्रह हो तो यह योग बनता है। इस योग में भाई-बहन को कष्ट, प्रराक्रम में कमी, भाग्योदय में बाधा, नौकरी में कष्ट विदेश प्रवास में कष्ट उठाने पड़ते है।

४) शंकपाल कालसर्प योग: -

यदि राहु नवम में एवं केतु तृतीय में हो तो यह योग बनता है, जातक भाग्यहीन हो अपमानित होता है, पिता का सुख नहीं मिलता एवं नौकरी में बार-बार निलंबित होता है।

५) महापादन कालसर्प योग: -

यदि राहु छठे भाव में एवं केतु व्यव भाव में हो तो यह योग बनता है। इसमें पत्नी विरह आय में कमी, चरित्र हनन का कष्ट भोगना पड़ता है।

६) पदन कालसर्प योग: -

अगर पंचम भाव में राहु एवं एकादश में केतु हो तो यह योग बनता है। इस योग में संतान सुख का अभाव एवं वृद्धा अवस्था में भारी हानि होती है।

७) तक्षक कालसर्प योग: -

यदि राहु सप्तम में एवं मेतु लग्न में हो तो यह योग बनता है, ऐसे जातक की पैतृक सम्पति नष्ट होती है, पत्नी सुख नहीं मिलता, बार-बार जेल यात्रा करनी पड़ती है।

८) कर्कोटक कालसर्प योग: -

यदि राहु अष्टम में एवं धन भाव में हो तो यह योग बनता है। इस योग में भाग्य को लेकर जातक को परेशानी होती है, नौकरी की संभावनाएं कम रहती है। व्यापार नहीं चलता, पैतृक संपत्ति नहीं मिलती और ना-ना प्रकार की बीमारियां घेर लेती है।

९) शंखचूड़ कालसर्प योग: -

यदि राहु सुख भाव में एवं केतु कर्म भाव में हो तो यह योग बनता है। ऐसे जातक के व्यवसाय में उतार चढाव एवं स्वास्थय ख़राब रहता है।

१०) घातक कालसर्प योग: -

यदि राहु दशम एवं केतु सुख भाव में हो तो यह योग बनता है, ऐसे जातक संतान के रोग से परेशान रहते है, माता या पिता का वियोग होता है।

११) विषधर कालसर्प योग: -

यदि राहु ळाभ में एवं केतु पुत्र भाव में हो तो यह योग बनता है, ऐसा जातक घर से दूर रहता है, भाइयो से विवाद रहता है, हृदय रोग होता है एवं शरीर जर्जर हो जाता है।

१२) शेषनाग कालसर्प योग: -

यदि राहु व्यय में एवं केतु रोग में हो तो यह योग बनता है, ऐसे जातक शत्रुओ से पीड़ित हो शरीर सुखित नहीं रहेगा आँख ख़राब होगा एवं न्यायालय का चक्कर लगाता है।

कालसर्प दोष शान्ति के प्रमुख स्थल:

कालसर्प योग शान्ति के लिए भारत में कुछ प्रसिद्ध पूजा स्थल है जंहा वैदिक विधि-विधानपूर्वक इस योग की शान्ति कराकर पीड़ित व्यक्ति को इसके दुष्प्रभाव से मुक्त कराया जा सकता है।

इनका विवरण इस प्रकार है।
सभी १२ ज्योतिर्लिंग स्थल
त्रियंबकेश्वर मंदिर, नासिक (महाराष्ट्र)
इलाहाबाद, (उत्तरप्रदेश)
कालहस्ती शिव मंदिर (आँध्रप्रदेश)
कलिकापीठ, कालीघाट (कोलकाता)
चामुंडा शक्ति पीठ (हिमाचल प्रदेश)
माँ मनसादेवी शक्ति पीठ (चंडीगढ़)

शनिदेव: -

शास्त्रों में शनि देव को नीले वस्त्र धारण करने वाला, हाथो में धनुष और शूल धारण किये हुए, गिद्ध की सवारी किये हुए कहा है और ज्योतिष विद्या के अनुसार हाथी, घोडा, शेर, सियार, हिरन, गधा और कुत्ता, भैंसा व गिद्ध शनि देव के नौ वाहन है।

साढ़ेसाती का प्रभाव:

यह सही है की साढ़ेसाती के समय व्यक्ति को कठिनाइयों एवं परेशानियों का सामना करना होता है परन्तु इसमें घबराने वाली बात नहीं है। इसमें कठिनाई और मुश्किल हालत जरूर आते हैं। परन्तु इस दौरान व्यक्ति को कामयाबी भी मिलती हैं। बहुसत से व्यक्ति साढ़ेसाती के प्रभाव से सफलता की ऊंचाइयों पर पहुँच जाते हैं। साढ़ेसाती व्यक्ति को कर्मशील बनाती हैं, और उसे कर्म की और ले जाति हैं। हठी, अभिमानी और कठोर व्यक्तियों से यह काफी मेहनत करवाती हैं।

शनि साढ़ेसाती के चरण:

  • प्रथम चरण का फल
  • साढ़ेसाती का दूसरा चरण का फल
  • साढ़ेसाती का तीसरा चरण का फल

शनि की ढैया:

जन्म चंद्र से जब गोचर का शनि चौथे अथवा आठवें भाव में गोचर करता हैं तब शनि की ढैया आरम्भ होती हैं। ढैया अर्थात ढाई साल का समय जन्मकुंडली का अच्छी तरह से विश्लेषण करने के बाद ही शनि की ढैया का प्रभाव बताना चाहिए यह अच्छी अथवा बुरी तब होगी जब कुंडली में समस्याएं होगी।

शनि श्लोक:

नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।

शनि लघुमंत्र: – ॐ शं शनैश्चराय नम:
बीज मंत्रो: – ॐ प्राः प्रिं प्रौं सः शनये नमः
जाप: – 2300

मांगलिक दोष:

मांगलिक योग: -

जब वर या कन्या की कुंडली में मंगल लगन, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भाव में हो तो मांगलिक दोष कहलाता हैं।

मंगल दोष के लक्षण: -

  • विवाह के समय विघ्न आते हैं।
  • जातक का विवाह सम्बन्ध तय नहीं पाता।
  • विवाह सम्बन्ध तय होकर छूट जाता हैं।
  • अधिक उम्र गुजरने पर भी विवाह नहीं हो पाता।
  • विवाह पश्चात् जीवन साथी से प्राय: विवाद के कारण पति-पत्नी के संबंधोमें कटुता की स्थिति बानी रहती हैं।
लगन भाव में मंगल
चतुर्थ भाव में मंगल
सप्तम भाव में मंगल
अष्टम भाव में मंगल
द्वादश भाव में मंगल

लगन भाव में मंगल: -

लग्न में बैठा मंगल अपनी स्थिति द्वारा जातक के शरीर में एवं सप्तम भाव को दृस्टि द्वारा प्रभावित करके, मंगल, जातक के वैवाहिक जीवन में अतिरिक्त उत्तेजना एवं क्रूरता भर देता हैं। और जातक को अतिभोगी बनाता हैं। यदि जातक के जीवनसाथी में उसके इन गुणों या अवगुणो को सहने की क्षमता नहीं होती हैं तो उसके वैवाहिक जीवन में विष घुल जाता हैं।

चतुर्थ भाव में मंगल: -

जन्मपत्रिका का चतुर्थ भाव जातक के सुख का भाव हैं और मंगल यहाँ दिशाबल से हीन होता हैं। यहाँ से मंगल सप्तम दशम और एकादश भाव को प्रभावित करता हैं। अर्थात इन भावो में अतिरिक्त ऊर्जा प्रभावित करता हैं। चतुर्थस्थ मंगल इस स्थिति में जातक के विवाह एवं वैवाहिक जीवन उसके सुख को और आयु को प्रभावित करता है।

सप्तम भाव में मंगल: -

मंगल की यह स्थिति अधिक प्रबल होती हैं जो जातक के जीवन में सप्तम भाव सम्बंधित सभी क्षेत्रों में पूर्ण प्रभाव डालती हैं। विवाह के लिए सप्तम भाव मुख्य भाव होता हैं इसलिए जातक के विवाह और वैवाहिक जीवन में इसका पूर्ण प्रभाव होता हैं। सप्तमस्थ मंगल दृस्टि द्वारा दशम लग्न और द्वितीय भाव की प्रभावित करके जातक को आवेशी, क्रोधी और कामुक बनाता हैं।

अष्टम भाव में मंगल: -

जन्मपत्रिका में अष्टम भाव जातक की आयु का भाव और सप्तम से द्वितीय भाव होने से उसके जीवनसाथी का मारक भाव होता हैं। सप्तम विवाह का भाव हैं तो लग्न से द्वितीय भाव जातक के लिए मारक भाव के साथ-साथ सप्तम से अष्टम भाव होने के कारण विवाह की आयु का भाव होता हैं। जिसको अष्टमस्थ मंगल अपनी दृस्टि द्वारा प्रभावित करके इस स्थिति में भी जातक के विवाह और वैवाहिक जीवन को पूर्ण रूप से प्रभावित करता हैं।

द्वादश भाव में मंगल: -

द्वादश भाव व्यव भाव होने के साथ-साथ शयन सुख, अस्पताल, कारावास और मोक्ष अर्थात मृत्यु का भाव भी कहलाता हैं साथ ही यह भाव सप्तम से अष्टम अर्थात वैवाहिक जीवन का शत्रु और रोग भाव भी हैं।

मंगल श्लोक:

धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कान्ति समप्रभम्।
कुमारं शक्तिहस्तं च मंगल प्रणमाम्यहम्।।

बीज मंत्र:

ॐ क्रां क्रीं क्रौं सभौमाय नमः

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